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शे'र
हम ऐसे ग़र्क़ दरिया-ए-गुनह जन्नत में जा निकलेतवान-ए-लत्मा-ए-मौज-ए-शफ़ा’अत हो तो ऐसी हो
आसी गाज़ीपुरी
शे'र
कब दिमाग़ इतना कि कीजे जा के गुल-गश्त-ए-चमनऔर ही गुलज़ार अपने दिल के है गुलशन के बीच
मीर मोहम्मद बेदार
शे'र
दिल बुझा जाए है अग़्यार की शोरिश पे मिरासर्द करती है तिरी गर्मी-ए-बाज़ार मुझे