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शे'र
जैसी चाहे कोशिशें कर वाइ'ज़-ए-बातिन-ख़राबतेरे रहने को तो जन्नत में मकाँ मिलता नहीं
अकबर वारसी मेरठी
शे'र
नातिक़ लखनवी
शे'र
जिसे कहते हैं मौत इक बे-ख़ुदी की नींद है 'शाएक़'परेशानी है जिस का नाम वो है ज़िंदगी अपनी
पंडित शाएक़ वारसी
शे'र
वही इंसान है 'एहसाँ' कि जिसे इल्म है कुछहक़ ये है बाप से अफ़्ज़ूँ रहे उस्ताद का हक़
अब्दुल रहमान एहसान देहलवी
शे'र
वही इंसान है 'एहसाँ' कि जिसे इ’ल्म है कुछहक़ ये है बाप से अफ़्ज़ूँ रहे उस्ताद का हक़
अब्दुल रहमान एहसान देहलवी
शे'र
वही इंसान है 'एहसाँ' कि जिसे इल्म है कुछहक़ ये है बाप से अफ़्ज़ूँ रहे उस्ताद का हक़
अब्दुल रहमान एहसान देहलवी
शे'र
क़फ़स में भी वही ख़्वाब-ए-परेशाँ देखता हूँ मैंकि जैसे बिजलियों की रौ फ़लक से आशियाँ तक है
बेदम शाह वारसी
शे'र
रात गए यूँ दिल को जाने सर्द हवाएँ आती हैंइक दरवेश की क़ब्र पे जैसे रक़्क़ासाएँ आती हैं
मुज़फ़्फ़र वारसी
शे'र
कू-ब-कू फिरता हूँ मैं ख़ाना-ख़राबों की तरहजैसे सौदे का तेरे सर में मेरे घर हो गया