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क़ैसर शाह वारसी
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ऐ जान-ए-मन जानान-ए-मन हम दर्द-ओ-हम दरमान-ए-मनदीन-ए-मन-ओ-ईमान-ए-मन अम्न-ओ-अमान-ए-उम्मताँ
अहमद रज़ा ख़ान
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ये नर्म-ओ-नातवाँ मौजें ख़ुदी का राज़ क्या जानेंक़दम लेते हैं तूफ़ाँ अज़्मत-ए-साहिल समझते हैं
जिगर मुरादाबादी
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ग़म-ए-जानाँ ग़म-ए-अय्याम के साँचे में ढलता हैकि इक ग़म दूसरे का चारागर है हम न कहते थे
वासिफ़ अली वासिफ़
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ग़म-ए-जानाँ ग़म-ए-अय्याम के साँचे में ढलता हैकि इक ग़म दूसरे का चारागर है हम न कहते थे
वासिफ़ अली वासिफ़
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ग़म-ए-जानाँ से दिल मानूस जब से हो गया मुझ कोहँसी अच्छी नहीं लगती ख़ुशी अच्छी नहीं लगती
पुरनम इलाहाबादी
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ग़म-ए-जानाँ से दिल मानूस जब से हो गया मुझ कोहँसी अच्छी नहीं लगती ख़ुशी अच्छी नहीं लगती
पुरनम इलाहाबादी
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ग़म-ए-जानाँ से दिल मानूस जब से हो गया मुझ कोहँसी अच्छी नहीं लगती ख़ुशी अच्छी नहीं लगती
पुरनम इलाहाबादी
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ग़म-ए-जानाँ से दिल मानूस जब से हो गया मुझ कोहँसी अच्छी नहीं लगती ख़ुशी अच्छी नहीं लगती
पुरनम इलाहाबादी
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दुनिया के हर इक ग़म से बेहतर है ग़म-ए-जानाँसौ शम्अ' बुझा कर हम इक शम्अ' जला लेंगे
फ़ना निज़ामी कानपुरी
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कहीं है आँख आ’शिक़ की कहीं दीदार-ए-जानाँ हैबहार-ए-हुस्न-इ-ताबाँ में तू ही तू है तू ही तू है