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शे'र
'आरिफ़ा' है हक़ यही बस ग़ैर-ए-हक़ कुछ भी न जानपी मय-ए-वहदत यहाँ ताख़ीर की हाजत नहीं
किशन सिंह आरिफ़
शे'र
अब दिल का है वीरान चमन वो गुल हैं कहाँ कैसा गुलशनठहरा है क़फ़स ही अपना वतन सय्याद मुझे आज़ाद न कर
महबूब वारसी गयावी
शे'र
महबूब वारसी गयावी
शे'र
दम तोड़ रहा है देख ज़रा आ’शिक़ है तिरा कुश्ता है तिराऐ मोहनी सूरत वाले हसीं महबूब को यूँ बर्बाद न कर
महबूब वारसी गयावी
शे'र
लाया तुम्हारे पास हूँ या पीर अल-ग़ियासकर आह के क़लम से मैं तहरीर अल-ग़ियास
शाह नियाज़ अहमद बरेलवी
शे'र
क्यूँ-कर न क़ुर्ब-ए-हक़ की तरफ़ दिल मिरा कीजिएगर्दन असीर-ए-हल्क़ा-ए-हबल-उल-वरीद है
बेदम शाह वारसी
शे'र
ख़्वाब 'बेदार' मुसाफ़िर के नहीं हक़ में ख़ूबकुछ भी है तुझ को ख़बर हम-सफ़राँ जाते हैं
मीर मोहम्मद बेदार
शे'र
कहीं है अ’ब्द की धुन और कहीं शोर-ए-अनल-हक़ हैकहीं इख़्फ़ा-ए-मस्ती है कहीं इज़हार-ए-मस्ती है
बेदम शाह वारसी
शे'र
अब तो मैं राहरव-मुल्क-ए-अ’दम होता हूँतिरा हर हाल में हाफ़िज़ है ख़ुदा मेरे बा’द