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जिस्म का रेशा रेशा मचले दर्द-ए-मोहब्बत फ़ाश करेइ’शक में 'काविश' ख़ामोशी तो सुख़नवरी से मुश्किल है
अब्दुल हादी काविश
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मेरा जिस्म और मिरी जाँ है वही जाँ बिल्कुलमैं कहूँ क्या कि मैं हूँ यार है अल्लाह अल्लाह
मर्दान सफ़ी
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कश्ती है सुकूँ की मौजों में इतना ही सहारा काफ़ी हैमेरे लिए तो ऐ जान-ए-जहाँ बस नाम तुमहारा काफ़ी है
शाह तक़ी राज़ बरेलवी
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ख़ुदा शाहिद है इस शम्‘अ-ए-फ़रौज़ाँ की ज़िया तुम होमैं हरगिज़ ये नहीं कहता तुमहें मेरे ख़ुदा तुम हो
शाह तक़ी राज़ बरेलवी
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ये राज़ की बातें हैं इस को समझे तो कोई क्यूँकर समझेइंसान है पुतला हैरत का मजबूर भी है मुख़्तार भी है
अहक़र बिहारी
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ये नर्म-ओ-नातवाँ मौजें ख़ुदी का राज़ क्या जानेंक़दम लेते हैं तूफ़ाँ अज़्मत-ए-साहिल समझते हैं
जिगर मुरादाबादी
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क़ैसर शाह वारसी
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कूचे में तिरे ऐ जान-ए-ग़ज़ल ये राज़ खुला हम पर आ करग़म भी तो इनायत है तेरी हम ग़म का मुदावा भूल गए
अब्दुल हादी काविश
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तुराब अली दकनी
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ख़ुश नहीं इफ़शा-ए-राज़-ए-दिल-रुबा पेश-ए-उमूमहातिफ़-ए-ग़ैबी मुझे इज़हार कहता है कि बोल