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शे'र
पस-ए-मुर्दन तो मुझ को क़ब्र में राहत से रहने दोतुम्हारी ठोकरों से उड़ता है ख़ाका क़यामत का
अकबर वारसी मेरठी
शे'र
वही अब बा'द-ए-मुर्दन क़ब्र पर आँसू बहाते हैंन आया था जिन्हें मेरी मोहब्बत का यक़ीं बरसों
मुज़तर ख़ैराबादी
शे'र
वही अब बा'द-ए-मुर्दन क़ब्र पर आँसू बहाते हैंन आया था जिन्हें मेरी मोहब्बत का यक़ीं बरसों
मुज़तर ख़ैराबादी
शे'र
दफ़्न हूँ एहसास की सदियों पुरानी क़ब्र मेंज़िंदगी इक ज़ख़्म है और ज़ख़्म भी ताज़ा नहीं