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शे'र
या तू ने नज़र ख़ीरा कर दी ऐ बर्क़-ए-तजल्ली या हम हीदीदार में अपनी आँखों का एहसान उठाना भूल गए
कामिल शत्तारी
शे'र
अब्दुल हादी काविश
शे'र
अब्दुल हादी काविश
शे'र
ऐ चारागर-ए-ख़ुश-फ़हम ज़रा कुछ अक़्ल की ले कुछ होश की लेबीमार-ए-मोहब्बत भी तुझ से नादान कहीं अच्छा होगा
कामिल शत्तारी
शे'र
'इश्क़ की आईना-दारी जज़्बा-ए-कामिल में हैवो मिरे दिल में है पहले से जो उन के दिल में है