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शे'र
फ़क़ीर-ए-‘कादरी’ जो देखते हैं चश्म-ए-बीना सेतो बंदे को ख़ुदा कहने की जुर्अत आ ही जाती है
ग़ुलाम रसूल क़ादरी
शे'र
माहिरउल क़ादरी
शे'र
मेहर-ए-ख़ूबाँ ख़ाना-अफ़रोज़-ए-दिल-अफ़सुर्दः हैशो'ला आब-ए-ज़ि़ंदगानी-ए-चराग़-ए-मुर्दः है
मीर मोहम्मद बेदार
शे'र
माहिरउल क़ादरी
शे'र
उ’मूमन ख़ाना-ए-दिल में मोहब्बत आ ही जाती हैख़ुदी ख़ुद-ए’तिमादी में बदल जाये तो बंदों को
ग़ुलाम रसूल क़ादरी
शे'र
ऐ जान-ए-मन जानान-ए-मन हम दर्द-ओ-हम दरमान-ए-मनदीन-ए-मन-ओ-ईमान-ए-मन अम्न-ओ-अमान-ए-उम्मताँ
अहमद रज़ा ख़ान
शे'र
नई है बिलकुल नई है साहब ये दास्ताँ जो सुना रहा हूँअभी अभी ही बना हूँ बंदा पहले मैं भी ख़ुदा रहा हूँ
ग़ुलाम रसूल क़ादरी
शे'र
ख़ुदी ख़ुद-ए’तिमादी में बदल जाये तो बंदों कोख़ुदा से सरकशी करने की नौबत आ ही जाती है
ग़ुलाम रसूल क़ादरी
शे'र
मुरीद-ए-पीर-ए-मय-ख़ाना हुए क़िस्मत से ऐ नासेहन झाड़ें शौक़ में पलकों से हम क्यूँ सहन-ए-मय-ख़ाना
इब्राहीम आजिज़
शे'र
हस्ती की इस किताब के मा’नों पे ख़ूब ग़ौर करलाखों क़ुरआन हैं निहाँ रिंद की कायनात में