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शे'र
शब जो होली की है मिलने को तिरे मुखड़े से जानचाँद और तारे लिए फिरते हैं अफ़्शाँ हाथ में
ग़ुलाम हमदानी मुसहफ़ी
शे'र
निकल कर ज़ुल्फ़ से पहुँचूँगा क्यूँकर मुसहफ़-ए-रुख़ परअकेला हूँ अँधेरी रात है और दूर मंज़िल है
अकबर वारसी मेरठी
शे'र
दवाँ हो कश्ती-ए-'उम्र-ए-रवाँ यूँ बहर-ए-हस्ती मेंकहीं उभरी कहीं डूबी कहीं मा'लूम होती है
अफ़क़र मोहानी
शे'र
ऐ जान-ए-मन जानान-ए-मन हम-दर्द-ओ-हम-दरमान-ए-मनदीन-ए-मन-ओ-ईमान-ए-मन अम्न-ओ-अमान-ए-उम्मताँ
अहमद रज़ा ख़ान
शे'र
मुरीद-ए-पीर-ए-मय-ख़ाना हुए क़िस्मत से ऐ नासेहन झाड़ें शौक़ में पलकों से हम क्यूँ सहन-ए-मय-ख़ाना
इब्राहीम आजिज़
शे'र
'फ़क़ीर'-ए-क़ादिरी जो देखते हैं चश्म-ए-बीना सेतो बंदे को ख़ुदा कहने की जुर्अत आ ही जाती है
ग़ुलाम रसूल क़ादरी
शे'र
गुलशन-ए-जन्नत की क्या परवा है ऐ रिज़वाँ उन्हेंहैं जो मुश्ताक़-ए-बहिश्त-ए-जावेदान-ए-कू-ए-दोस्त