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जिगर मुरादाबादी
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मय-ख़ाना में ख़ुदी को नहीं दख़्ल शैख़-जीबे-ख़ुदी हुआ है जिन ने पिया है वो जाम-ए-ख़ास
ख़्वाजा रुक्नुद्दीन इश्क़
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ऐ 'तुराब' जब गुल-बदन के दर्द सूँ गिर्यां कियादामन-ए-गुल पर मिरा हर अश्क दुर्दाना हुआ
तुराब अली दकनी
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ख़ुद अदा मरती है जिस पर वो अदा कुछ और हैहै वफ़ा भी जिस पे सदक़े वो जफ़ा कुछ और है
तसद्दुक़ अ’ली असद
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शैदा-ए-रू-ए-गुल न हैं शैदा-ए-क़द्द-ए-सर्वसय्याद के शिकार हैं इस बोसताँ में हम
ख़्वाजा हैदर अली आतिश
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आप की मज्लिस-ए-’आली में ’अलर्रग़्म रक़ीबब-इजाज़त ये गुनहगार उठे और बैठे
अब्दुल रहमान एहसान देहलवी
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ऐ जान-ए-मन जानान-ए-मन हम-दर्द-ओ-हम-दरमान-ए-मनदीन-ए-मन-ओ-ईमान-ए-मन अम्न-ओ-अमान-ए-उम्मताँ
अहमद रज़ा ख़ान
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ग़म-ए-जानाँ ग़म-ए-अय्याम के साँचे में ढलता हैकि इक ग़म दूसरे का चारागर है हम न कहते थे
वासिफ़ अली वासिफ़
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ग़म-ए-जानाँ ग़म-ए-अय्याम के साँचे में ढलता हैकि इक ग़म दूसरे का चारागर है हम न कहते थे
वासिफ़ अली वासिफ़
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ख़ून-ए-नाहक़ की शहादत के लिए काफ़ी है येदामन-ए-क़ातिल पे जो धब्बे लहू के जम रहे