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बहार-ए-लाला-ओ-गुल लुत्फ़-ए-सब्ज़ा-ओ-सुंबुलमज़ा था हम जो गुलिस्तान में आज-कल जाते
है लुत्फ़ ज़िंदगी का ब'अद-अज़-फ़ना उसी मेंनाम-ए-ख़ुदा जो अपने सब तन-बदन से निकले
उधर हर वार पर क़ातिल को बरसों लुत्फ़ आया हैइधर हर ज़ख़्म ने दी है सदा-ए-आफ़रीं बरसों
'असर' इन सुलूकों पे क्या लुत्फ़ हैफिर उस बे-मुरव्वत के घर जाइए
दीवानों पे किस दर्जा तिरा लुत्फ़-ओ-करम हैबख़्शा है जो ग़म तू ने वही हासिल-ए-ग़म है
सितम करते मिल कर तो फिर लुत्फ़ थाजुदाई में क्या आज़माया मुझे
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