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शे'र
ख़त-ए-क़िस्मत मिटाते हो मगर इतना समझ लेनाये हर्फ़-ए-आरज़ू हाथों की रंगत ले के उट्ठेंगे
मुज़तर ख़ैराबादी
शे'र
ख़त-ए-क़िस्मत मिटाते हो मगर इतना समझ लेनाये हर्फ़-ए-आरज़ू हाथों की रंगत ले के उट्ठेंगे
मुज़तर ख़ैराबादी
शे'र
रिंद हूँ ब-ख़ुदा मगर ‘बेख़ुद’ हूँ बे-ख़ुदा नहींतुम ही मेरे हो पेशवा या’नी कि ना-ख़ुदा भी तुम
बेख़ुद सुहरावर्दी
शे'र
जिगर मुरादाबादी
शे'र
नहीं आँख जल्वा-कश-ए-सहर ये है ज़ुल्मतों का असर मगरकई आफ़्ताब ग़ुरूब हैं मिरे ग़म की शाम-ए-दराज़ में
सीमाब अकबराबादी
शे'र
महबूब वारसी गयावी
शे'र
तू लाख करे इंकार मगर बातों में तिरी कौन आता हैईमान मिरा ये मेरा यक़ीं तू और नहीं मैं और नहीं
अब्दुल हादी काविश
शे'र
काम कुछ तेरे भी होते तेरी मर्ज़ी के ख़िलाफ़हाँ मगर मेरे ख़ुदा तेरा ख़ुदा कोई नहीं