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शे'र
जब तक एक हसीं मकीं था दिल में हर-सू फूल खिले थेवो उजड़ा तो गुलशन उजड़ा और हुआ आबाद नहीं है
बेख़ुद सुहरावर्दी
शे'र
कभी दैर-ओ-का'बः बता दिया कभी ला-मकाँ का पता दियाजो ख़ुदी को हम ने मिटा दिया तो वो अपने-आप में पा गए
अकबर वारसी मेरठी
शे'र
क्या कहूँ क्या ला-मकाँ में उ’म्र 'मुज़्तर' काट दीबे-ख़ुदी ने जिस जगह रखा वहाँ रहना पड़ा