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शे'र
फ़क़ीर-ए-‘कादरी’ जो देखते हैं चश्म-ए-बीना सेतो बंदे को ख़ुदा कहने की जुर्अत आ ही जाती है
ग़ुलाम रसूल क़ादरी
शे'र
उ’मूमन ख़ाना-ए-दिल में मोहब्बत आ ही जाती हैख़ुदी ख़ुद-ए’तिमादी में बदल जाये तो बंदों को
ग़ुलाम रसूल क़ादरी
शे'र
नई है बिलकुल नई है साहब ये दास्ताँ जो सुना रहा हूँअभी अभी ही बना हूँ बंदा पहले मैं भी ख़ुदा रहा हूँ
ग़ुलाम रसूल क़ादरी
शे'र
ख़ुदी ख़ुद-ए’तिमादी में बदल जाये तो बंदों कोख़ुदा से सरकशी करने की नौबत आ ही जाती है
ग़ुलाम रसूल क़ादरी
शे'र
हस्ती की इस किताब के मा’नों पे ख़ूब ग़ौर करलाखों क़ुरआन हैं निहाँ रिंद की कायनात में
ग़ुलाम रसूल क़ादरी
शे'र
सीमाब अकबराबादी
शे'र
जो मिटा है तेरे जमाल पर वो हर एक ग़म से गुज़र गयाहुईं जिस पे तेरी नवाज़िशें वो बहार बन के सँवर गया
फ़ना बुलंदशहरी
शे'र
गुनाह करता है बरमला तू किसी से करता नहीं हया तूख़ुदा को क्या मुंह दिखाएगा तू ज़रा ऐ बे-हया हया कर