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शे'र
मैं समझूँगा कि मेरे दाग़-ए-इस्याँ धुल गए सारेअगर आँसू तिरी चश्म-ए-तग़ाफ़ुल से निकल आया
मुज़तर ख़ैराबादी
शे'र
मेरे अ'र्ज़-ए-ग़म पे वो कहना किसी का हाए हाएशिकवा-ए-ग़म शेवा-ए-अहल-ए-वफ़ा होता नहीं
जिगर मुरादाबादी
शे'र
अब्र-ए-दूद-ए-दिल जो घर को छाए रहता है मेरेरहती है फ़ुर्क़त की शब बाहर ही बाहर चाँदनी
आसी गाज़ीपुरी
शे'र
सामने मेरे ही वो जाते हैं बज़्म-ए-ग़ैर मेंअल-मदद ऐ ज़ब्त मुझ को कब तक उस का ग़म रहे