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शे'र
जो मिटा है तेरे जमाल पर वो हर एक ग़म से गुज़र गयाहुईं जिस पे तेरी नवाज़िशें वो बहार बन के सँवर गया
फ़ना बुलंदशहरी
शे'र
सीमाब अकबराबादी
शे'र
ख़ुदा भी जब न हो मालूम तब जानो मिटी हस्तीफ़ना का क्या मज़ा जब तक ख़ुदा मालूम होता है
मुज़तर ख़ैराबादी
शे'र
कहूँ क्या कि गुलशन-ए-दहर में वो अजब करिश्मे दिखा गएकहीं आशिक़ों को मिटा गए कहीं लन-तरानी सुना गए
अकबर वारसी मेरठी
शे'र
कभी दैर-ओ-का'बः बता दिया कभी ला-मकाँ का पता दियाजो ख़ुदी को हम ने मिटा दिया तो वो अपने-आप में पा गए