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शे'र
ख़त-ए-क़िस्मत मिटाते हो मगर इतना समझ लेनाये हर्फ़-ए-आरज़ू हाथों की रंगत ले के उट्ठेंगे
मुज़तर ख़ैराबादी
शे'र
ख़त-ए-क़िस्मत मिटाते हो मगर इतना समझ लेनाये हर्फ़-ए-आरज़ू हाथों की रंगत ले के उट्ठेंगे
मुज़तर ख़ैराबादी
शे'र
नहीं आँख जल्वा-कश-ए-सहर ये है ज़ुल्मतों का असर मगरकई आफ़्ताब ग़ुरूब हैं मिरे ग़म की शाम-ए-दराज़ में
सीमाब अकबराबादी
शे'र
रिंद हूँ ब-ख़ुदा मगर ‘बेख़ुद’ हूँ बे-ख़ुदा नहींतुम ही मेरे हो पेशवा या’नी कि ना-ख़ुदा भी तुम