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शे'र
तुम अपनी ज़ुल्फ़ खोलो फिर दिल-ए-पुर-दाग़ चमकेगाअंधेरा हो तो कुछ कुछ शम्अ' की आँखों में नूर आए
मुज़तर ख़ैराबादी
शे'र
मुबारक ज़ाहिदों को फिर बाग़-ए-ख़ुल्द 'कौसर'न जन्नत मेरे क़ाबिल है न मैं जन्नत के क़ाबिल हूँ
कौसर ख़ैराबादी
शे'र
तुझ से मिलने का बता फिर कौन सा दिन आएगाई’द को भी मुझ से गर ऐ मेरी जाँ मिलता नहीं