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चश्मः-ए-जारी खास्सः-ए-बारी गर्द-सवारी बाद-ए-बहारीआईना-दारी फ़ख़्र-ए-सिकन्दर सल्लल्लाहो अ’लैहे-वसल्लम
अमीर मीनाई
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अब तो मैं राहरव-मुल्क-ए-अ’दम होता हूँतिरा हर हाल में हाफ़िज़ है ख़ुदा मेरे बा’द
मौलाना अब्दुल क़दीर सिद्दीक़ी
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अपने हाथों मेहंदी लगाई माँग भी मैं ने देखो सजाईआए पिया घर रिम-झिम बरसे जाओ बता दो सावन को
अब्दुल हादी काविश
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आकाश की जगमग रातों में जब चाँद सितारे मिलते हैंदिल दे दे सनम को तू भी ये क़ुदरत के इशारे मिलते हैं
अब्दुल हादी काविश
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तू लाख करे इंकार मगर बातों में तिरी कौन आता हैईमान मिरा ये मेरा यक़ीं तू और नहीं मैं और नहीं
अब्दुल हादी काविश
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जिस्म का रेशा रेशा मचले दर्द-ए-मोहब्बत फ़ाश करेइ’शक में 'काविश' ख़ामोशी तो सुख़नवरी से मुश्किल है
अब्दुल हादी काविश
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चाँद सा मुखड़ा उस ने दिखा कर फिर नैनाँ के बाँड़ चला करसाँवरिया ने बीच-बजरिया लूट लियो इस निर्धन को
अब्दुल हादी काविश
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जा को कोई पकड़े तो कैसे काम करत है नज़र न आएचुपके चुपके सेंध लगावे दिन होवे या अँधेरी रतियाँ
अब्दुल हादी काविश
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आग लगी वो इशक की सर से मैं पाँव तक जलाफ़र्त-ए-ख़ुशी से दिल मिरा कहने लगा जो हो सो हो
अब्दुल हादी काविश
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चाँद सा मुखड़ा उस ने दिखा कर फिर नैनाँ के बाण चला करसँवरिया ने बीच-बजरिया लूट लियो इस निर्धन को
अब्दुल हादी काविश
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उठ के अँधेरी रातों में हम तुझ को पुकारा करते हैंहर चीज़ से नफ़रत हम को हुई हम जन्नत-ए-फ़र्दा भूल गए