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जो दिल हो जल्वा-गाह-ए-नाज़ इस में ग़म नहीं होताजहाँ सरकार होते हैं वहाँ मातम नहीं होता
कामिल शत्तारी
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जो दिल हो जल्वा-गाह-ए-नाज़ इस में ग़म नहीं होताजहाँ सरकार होते हैं वहाँ मातम नहीं होता
कामिल शत्तारी
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पस-ए-मुर्दन इरादा दिल में था जो कू-ए-क़ातिल कालहद में ख़ुश हुआ मैं नाम सुनकर पहली मंज़िल का
ग़ाफ़िल लखनवी
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हमारे दिल को बहर-ए-ग़म की क्या ताक़त जो ले बैठेवो कश्ती डूब कब सकती है जिस के नाख़ुदा तुम हो
मुज़तर ख़ैराबादी
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सीमाब अकबराबादी
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ये दिल में है जो घबराहट ये आँखों में है जो आँसूइस एहसाँ को भी बाला-ए-करम महसूस करता हूँ
बहज़ाद लखनवी
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अब्र-ए-दूद-ए-दिल जो घर को छाए रहता है मेरेरहती है फ़ुर्क़त की शब बाहर ही बाहर चाँदनी
आसी गाज़ीपुरी
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जो कुछ भी ख़ुशी से होता है ये दिल का बोझ ना बन जाएपैमान-ए-वफ़ा भी रहने दो सब झूटी बातें होती हैं
आरज़ू लखनवी
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हवस जो दिल में गुज़रे है कहूँ क्या आह मैं तुम कोयही आता है जी में बन के बाम्हन आज तो यारो
नज़ीर अकबराबादी
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ढ़ूंढ़े असरार-ए-ख़ुदा दिल ने जो अंधा बन कररह गया आप ही पहलू में मुअ’म्मा बन कर
इम्दाद अ'ली उ'ल्वी
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क्या ग़म जो टूट जाएँ जिगर, जाँ, कलेजा, दिलपर तेरी चाह की न तमन्ना शिकस्त हो
सुलेमान शिकोह गार्डनर
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दिल में जो रहते थे उम्मीद की दुनिया हो करवो चले जाते हैं क्यूँ दाग़-ए-तमन्ना हो कर
हैरत शाह वारसी
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दिल बुझा जाए है अग़्यार की शोरिश पे मिरासर्द करती है तिरी गर्मी-ए-बाज़ार मुझे