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शे'र
वो ऐ 'सीमाब' क्यूँ सर-ग़श्तः-ए-तसनीम-ओ-जन्नत होमयस्सर जिस को सैर-ए-ताज और जमुना का साहिल है
सीमाब अकबराबादी
शे'र
पस-ए-मुर्दन तो मुझ को क़ब्र में राहत से रहने दोतुम्हारी ठोकरों से उड़ता है ख़ाका क़यामत का
अकबर वारसी मेरठी
शे'र
इ’श्क़ ने तोड़ी सर पे क़यामत ज़ोर-ए-क़यामत क्या कहिएसुनने वाला कोई नहीं रूदाद-ए-मोहब्बत क्या कहिए
जिगर मुरादाबादी
शे'र
वो सर और ग़ैर के दर पर झुके तौबा मआ'ज़-अल्लाहकि जिस सर की रसाई तेरे संग-ए-आस्ताँ तक है
बेदम शाह वारसी
शे'र
अदब से सर झुका कर क़ासिद उस के रू-ब-रू जानानिहायत शौक़ से कहना पयाम आहिस्ता आहिस्ता
अज़ीज़ सफ़ीपुरी
शे'र
वही अब बा'द-ए-मुर्दन क़ब्र पर आँसू बहाते हैंन आया था जिन्हें मेरी मोहब्बत का यक़ीं बरसों
मुज़तर ख़ैराबादी
शे'र
वही अब बा'द-ए-मुर्दन क़ब्र पर आँसू बहाते हैंन आया था जिन्हें मेरी मोहब्बत का यक़ीं बरसों
मुज़तर ख़ैराबादी
शे'र
मिरा सर कट के मक़्तल में गिरे क़ातिल के क़दमों परदम-ए-आख़िर अदा यूँ सज्दा-ए-शुकराना हो जाए