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शे'र
वाए क़िस्मत शम्अ' पूछे भी न परवानों की बातऔर बे-मिन्नत मिलें बोसे लब-ए-गुल-गीर को
बेनज़ीर शाह वारसी
शे'र
सिराज औरंगाबादी
शे'र
अब्दुल हादी काविश
शे'र
क़िस्मत जागे तो हम सोएँ क़िस्मत सोए तो हम जागेंदोनों ही को नींद आए जिसमें कब ऐसी रातें होती हैं
आरज़ू लखनवी
शे'र
ऐ 'तुराब' जब गुल-बदन के दर्द सूँ गिर्यां कियादामन-ए-गुल पर मिरा हर अश्क दुर्दाना हुआ
तुराब अली दकनी
शे'र
नहीं यारो ख़ुदा हरगिज़ तुम्हारे सुँ जुदा हैगाजिधर देखे उधर ममलू सदा नूर-ए-ख़ुदा हैगा