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शे'र
लफ़्ज़-ए-उल्फ़त की मुकम्मल शर्ह इक तेरा वजूदआ'शिक़ी में तोड़ डालीं ज़ाहिरी सारी क़ुयूद
अज़ीज़ वारसी देहलवी
शे'र
औघट शाह वारसी
शे'र
इ'श्क़ में तेरे गुल खा कर जान अपनी दी है 'नसीर' ने आहइस के सर-ए-मरक़द पर गुल रोला कोई दोना फूलों का
शाह नसीर
शे'र
शह-ए-बे-ख़ुदी ने अता किया मुझे अब लिबास-ए-बरहनगीन ख़िरद की बख़िया-गरी रही न जुनूँ की पर्दा-दरी रही
सिराज औरंगाबादी
शे'र
मैं न मानूँगा कि दी अग़्यार ने तर्ग़ीब-ए-क़त्लदुश्मनों से दोस्ती का हक़ अदा क्यूँकर हुआ
अमीर मीनाई
शे'र
पस-ए-मुर्दन तो मुझ को क़ब्र में राहत से रहने दोतुम्हारी ठोकरों से उड़ता है ख़ाका क़यामत का