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शे'र
लफ़्ज़-ए-उल्फ़त की मुकम्मल शर्ह इक तेरा वजूदआ'शिक़ी में तोड़ डालीं ज़ाहिरी सारी क़ुयूद
अज़ीज़ वारसी देहलवी
शे'र
नहीं बंदा हक़ीक़त में समझ असरार मा'नी काख़ुदी का वहम बरहम ज़न पिछे बे-ख़ुद ख़ुदाई कर
क़ादिर बख़्श बेदिल
शे'र
जहान-ए-बे-ख़ुदी में मस्ती-ए-वहदत जो ले जायेफ़रिश्ते लें क़दम मेरे वो हूँ मैं रिंद-ए-मस्तान:
इब्राहीम आजिज़
शे'र
कोई मस्त-ए-मय-कद: आ गया मय-ए-बे-ख़ुदी पिला गयान सदा-ए-नग़्मा-ए-दैर उठे न हरम से शोर-ए-अज़ाँ उठा
रियाज़ ख़ैराबादी
शे'र
शह-ए-बे-ख़ुदी ने अता किया मुझे अब लिबास-ए-बरहनगीन ख़िरद की बख़िया-गरी रही न जुनूँ की पर्दा-दरी रही
सिराज औरंगाबादी
शे'र
ब-रोज़-ए-हश्र हाकिम क़ादिर-ए-मुतलक़ ख़ुदा होगाफ़रिश्तों के लिखे और शैख़ की बातों से क्या होगा
हरी चंद अख़्तर
शे'र
वो उ’रूज-ए-माह वो चाँदनी वो ख़मोश रात वो बे-ख़ुदीवो तसव्वुरात की सरख़ुशी तिरे साथ राज़-ओ-नियाज़ में
सीमाब अकबराबादी
शे'र
ख़ुदा रक्खे अजब कैफ़-ए-बहार-ए-कू-ए-जानाँ हैकि दिल है जल्वः-सामाँ तो नज़र जन्नत-ब-दामाँ है
अफ़क़र मोहानी
शे'र
ये नर्म-ओ-नातवाँ मौजें ख़ुदी का राज़ क्या जानेंक़दम लेते हैं तूफ़ाँ अज़्मत-ए-साहिल समझते हैं
जिगर मुरादाबादी
शे'र
मय-ख़ाना में ख़ुदी को नहीं दख़्ल शैख़-जीबे-ख़ुदी हुआ है जिन ने पिया है वो जाम-ए-ख़ास