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शे'र
तुम अपनी ज़ुल्फ़ खोलो फिर दिल-ए-पुर-दाग़ चमकेगाअंधेरा हो तो कुछ कुछ शम्अ' की आँखों में नूर आए
मुज़तर ख़ैराबादी
शे'र
इ’श्क़ की इब्तिदा भी तुम हुस्न की इंतिहा भी तुमरहने दो राज़ खुल गया बंदे भी तुम ख़ुदा भी तुम
बेदम शाह वारसी
शे'र
तुम न जाओ ज़ीनत-ए-गुलशन तुम्हारे दम से हैतुम चले जाओगे तो गुलशन में क्या रह जाएगा
पुरनम इलाहाबादी
शे'र
यहाँ इग़्माज़ तुम कर लो वहाँ देखेंगे महशर मेंछुड़ाना ग़ैर से दामन को और मुझ से गरेबाँ को
राक़िम देहलवी
शे'र
ख़ुदा शाहिद है इस शम्‘अ-ए-फ़रौज़ाँ की ज़िया तुम होमैं हरगिज़ ये नहीं कहता तुमहें मेरे ख़ुदा तुम हो
शाह तक़ी राज़ बरेलवी
शे'र
मुझे तुम देखते हो और उस हसरत से मैं तुम कोकि बुलबुल रू-ए-गुल को और गुल बुलबुल के अरमाँ को
राक़िम देहलवी
शे'र
तुम्हारे घर से हम निकले ख़ुदा के घर से तुम निकलेतुम्हीं ईमान से कह दो कि काफ़िर हम हैं या तुम हो
राक़िम देहलवी
शे'र
तुम्हारे घर से हम निकले ख़ुदा के घर से तुम निकलेतुम्हीं ईमान से कह दो कि काफ़िर हम हैं या तुम हो