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शे'र
वो सर और ग़ैर के दर पर झुके तौबा मआ'ज़-अल्लाहकि जिस सर की रसाई तेरे संग-ए-आस्ताँ तक है
बेदम शाह वारसी
शे'र
अदब से सर झुका कर क़ासिद उस के रू-ब-रू जानानिहायत शौक़ से कहना पयाम आहिस्ता आहिस्ता
अज़ीज़ सफ़ीपुरी
शे'र
लाया तुम्हारे पास हूँ या पीर अल-ग़ियासकर आह के क़लम से मैं तहरीर अल-ग़ियास
शाह नियाज़ अहमद बरेलवी
शे'र
ये कह कर ख़ाना-ए-तुर्बत से हम मय-कश निकल भागेवो घर क्या ख़ाक पत्थर है जहाँ शीशे नहीं रहते
मुज़तर ख़ैराबादी
शे'र
मुज़तर ख़ैराबादी
शे'र
सताता है मुझे सय्याद ज़ालिम इस लिए शायदकि रौनक़ उस के गुलशन की मिरे शग़्ल-ए-फ़ुग़ाँ तक है
वली वारसी
शे'र
अज़ल से मुर्ग़-ए-दिल को ख़तरा-ए-सय्याद क्या होताकि उस को तो असीर-ए-हल्क़ः-ए-फ़ित्राक होना था
अर्श गयावी
शे'र
हरे कपड़े पहन कर फिर न जाना यार गुलशन मेंगुलू-ए-शाख़-ए-गुल से ख़ून टपकेगा शहादत का
मोहम्मद अकबर वार्सी
शे'र
गुनाह करता है बरमला तू किसी से करता नहीं हया तूख़ुदा को क्या मुंह दिखाएगा तू ज़रा ऐ बे-हया हया कर