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फ़क़ीर-ए-‘कादरी’ जो देखते हैं चश्म-ए-बीना सेतो बंदे को ख़ुदा कहने की जुर्अत आ ही जाती है
ग़ुलाम रसूल क़ादरी
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देखो कू-ए-यार में मत हज़रत-ए-दिल राह-ए-अश्कइंतिज़ार-ए-क़ाफ़िलः मंज़िल पे क्यूँ खींचे हैं आप
शाह नसीर
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गदाई में मिली शाही मुझे उस की इ’नायत सेभला क्यूँकर अदा हो शुक्र उस के लुत्फ़-ए-बे-हद का
अख़्तर महमूद वारसी
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मिला क्या हज़रत-ए-आदम को फल जन्नत से आने कान क्यूँ उस ग़म से सीन: चाक हो गंदुम के दाने का
शाह नसीर
शे'र
अगर हम से ख़फ़ा होना है तो हो जाइए हज़रतहमारे बा’द फिर अंदाज़-ए-यज़्दाँ कौन देखेगा
अज़ीज़ वारसी देहलवी
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वहाँ तो हज़रत-ए-ज़ाहिद तुम्हें अच्छों से नफ़रत थीयहाँ जन्नत में अब किस मुँह से तुम लेने को हूर आए
मुज़तर ख़ैराबादी
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सुकून-ए-मुस्तक़िल दिल बे-तमन्ना शैख़ की सोहबतये जन्नत है तो इस जन्नत से दोज़ख़ क्या बुरा होगा
हरी चंद अख़्तर
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ब-रोज़-ए-हश्र हाकिम क़ादिर-ए-मुतलक़ ख़ुदा होगाफ़रिश्तों के लिखे और शैख़ की बातों से क्या होगा
हरी चंद अख़्तर
शे'र
शह-ए-बे-ख़ुदी ने अता किया मुझे अब लिबास-ए-बरहनगीन ख़िरद की बख़िया-गरी रही न जुनूँ की पर्दा-दरी रही
सिराज औरंगाबादी
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बेदम शाह वारसी
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उ’मूमन ख़ाना-ए-दिल में मोहब्बत आ ही जाती हैख़ुदी ख़ुद-ए’तिमादी में बदल जाये तो बंदों को