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शे'र
हर क़दम के साथ मंज़िल लेकिन इस का क्या इ’लाजइ’श्क़ ही कम-बख़्त मंज़िल-आश्ना होता नहीं
जिगर मुरादाबादी
शे'र
हर अदा नाज़ में है नोक-चौक उस के 'फ़िराक़'खुब गई जी में हमारे यार की बाँकी तरह
हकीम सनाउल्लाह ख़ान
शे'र
हुआ आईना से इज़हार उन का रू-ए-ज़ेबा हैबना मुम्किन है वाजिब से जो शनवा है वो गोया है