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शे'र
किस घर में किस हिजाब में ऐ जाँ निहाँ हो तुमहम राह देखते हैं तुम्हारी कहाँ हो तुम
शाह अकबर दानापूरी
शे'र
कूचा-ए-क़ातिल में जाकर हाथ से रक्खें तुझेओ दिल-ए-बेताब हमने इसलिए पाला नहीं
मिर्ज़ा फ़िदा अली शाह मनन
शे'र
तुम अपनी ज़ुल्फ़ खोलो फिर दिल-ए-पुर-दाग़ चमकेगाअंधेरा हो तो कुछ कुछ शम्अ' की आँखों में नूर आए
मुज़तर ख़ैराबादी
शे'र
शह-ए-बे-ख़ुदी ने अता किया मुझे अब लिबास-ए-बरहनगीन ख़िरद की बख़िया-गरी रही न जुनूँ की पर्दा-दरी रही