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कलाम
मिरे होते हुए कोई शरीक-ए-इम्तिहाँ क्यूँ होतिरा दर्द-ए-मोहब्बत भी नसीब-ए-दुश्मनाँ क्यूँ हो
बेदम शाह वारसी
कलाम
तिरी फ़ितरत अमीं है मुम्किनात ज़िंदगानी कीजहँ के जौहर मुज़्मर का गोया इम्तिहाँ तो है
अल्लामा इक़बाल
कलाम
ज़िंदगी में आ गया जब कोई वक़्त-ए-इम्तिहाँइस ने देखा है 'जिगर' बे-इख़्तियाराना मुझे
जिगर मुरादाबादी
कलाम
इम्तिहाँ का वक़्त है ईमान दूँ या जान दूँमैं बड़ी मुश्किल में हूँ मौला मिरी मुश्किल में आ
माहिर देहलवी
कलाम
क़दम साबित रहे राह-ए-वफ़ा में सख़्त मुश्किल हैफ़रिश्तों को डरा देता है या रब इम्तिहाँ तेरा
अज्ञात
कलाम
दिल को हम सर्फ-ए-वफ़ा समझे थे क्या मा'लूम थाया'नी ये पहले ही नज़्र-ए-इम्तिहाँ हो जाएगा