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कलाम
खुल गए ज़ख़्मों के मुँह क्या जाने क्या कहने को हैंक्या नमक-दान-ए-सितम को बे-मज़ा कहने को हैं
ख़्वाजा नासिरुद्दीन चिश्ती
कलाम
तू ने अपना जल्वा दिखाने को जो नक़ाब मुँह से उठा दियाहुई महव-ए-हैरत-ए-बे-खु़दी मुझे आईना सा बना दिया