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कलाम
ऐ जान ग़म-ए-दुश्मन में शोरीदा-सरी क्यूँ हैहम तो अभी ज़िंदा हैं ये जामा-दरी क्यूँ है
मुज़तर ख़ैराबादी
कलाम
इलाज-ए-दर्द-ए-दिल तुम से मसीहा हो नहीं सकतातुम अच्छा कर नहीं सकते मैं अच्छा हो नहीं सकता
मुज़तर ख़ैराबादी
कलाम
वुफ़ूर-ए-शौक़-ए-मुज़्तर है कि उन को हाय क्या कहिएनबी कहिए मलक कहिए बशर कहिए ख़ुदा कहिए
कशिश फुलवारवी
कलाम
मिरे मा'शूक़ तुम हो यार तुम हो दिल-बरा तुम होये सब कुछ हो मगर मैं कह नहीं सकता कि क्या तुम हो
मुज़तर ख़ैराबादी
कलाम
ज़ख़्मों से कलेजे को भर दे बर्बाद सुकून-ए-दिल कर देओ नाज़ भरी चितवन वाले आ और मुझे बिस्मिल कर दे
मुज़तर ख़ैराबादी
कलाम
सुण फ़रियाद पीराँ दिआ पीरा अरज़ सुणी कन धर के हूबेड़ा अड़या विच कपराँ दे जिथ मच्छ न बैहन्दे डर के हू
सुल्तान बाहू
कलाम
आरज़ू-ए-वस्ल-ए-जानाँ में सहर होने लगीज़िंदगी मानिंद-ए-शम्अ' मुख़्तसर होने लगी
ग़ुलाम मोईनुद्दीन गिलानी
कलाम
बीत गया हंगाम-ए-क़यामत रोज़-ए-क़यामत आज भी हैतर्क-ए-तअल्लुक़ काम न आया उन से मोहब्बत आज भी है