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कलाम
'सौदा-गर' हाल-ए-मिर्ज़ा पाकर ये कह रहा हैहै ज़ात कंज़-ए-मख़्फ़ी ज़ात-ए-बक़ा-ए-मिर्ज़ा
शाह सिद्दीक़ सौदागर
कलाम
तसद्दुक़ अ’ली असद
कलाम
क़ुर्बान-ए-फ़ना एक तजल्ली-ए-तेरी होएज़ुल्मत-कदा-ए-हस्तती-ए-मौहूम से निकले
मिर्ज़ा मोहम्मद अली फ़िदवी
कलाम
पढ़ो 'साबिर' कोई ऐसी ग़ज़ल बज़्म-ए-सुख़न-दाँ मेंकि ऐसा कोई गुलदस्ता न हो गुलज़ार-ए-रिज़वाँ में
मिर्ज़ा क़ादिर बख़्श साबिर
कलाम
ढूँढ उस जगह किशवर-ए-’अली बाब-ए-’इल्म है’उक़्दा वहीं से होवे है हल मुश्किलात का
मिर्ज़ा मोहम्मद अली फ़िदवी
कलाम
फिर चराग़-ए-लाला से रौशन हुए कोह-ओ-दमनमुझ को फिर नग़्मों पे उकसाने लगा मुर्ग़-ए-चमन
अल्लामा इक़बाल
कलाम
कामिल शत्तारी
कलाम
तर्क-ए-दुनिया तर्क-ए-’उक़्बा तर्क-ए-मौला तर्क-ए-तर्कया'नी यूँ बे-आरज़ू जीने की 'आदत कर के देख
कामिल शत्तारी
कलाम
सहर उस हुस्न के ख़ुर्शीद को जाकर जगा देखाज़ुहूर-ए-हक़ कूँ देखा ख़ूब देखा बा-ज़िया देखा