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कलाम
जो शबाब आया तो क्या कहूँ वो रात के जैसे बदल गएमग़रूर हुए हैं वो इस तरह जज़्बात के जैसे बदल गए
हुनर सिल्लोड़ी
कलाम
जिसे दीद तेरी नसीब हो वो नसीब क़ाबिल-ए-दीद हैकि शब-ए-बरात है रात उसे दिन उस के वास्ते 'ईद है