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कलाम
खुल गए ज़ख़्मों के मुँह क्या जाने क्या कहने को हैंक्या नमक-दान-ए-सितम को बे-मज़ा कहने को हैं
ख़्वाजा नासिरुद्दीन चिश्ती
कलाम
ता-बके ऐ ना-शगुफ़्ता ग़ुंचे ये मोहर-ए-सुकूतकुछ तो रंग-ए-बे-सबाती पर चमन के खिल के खुल