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कलाम
ख़ुदा महफ़ूज़ रखे 'इश्क़ के जज़्बात-ए-कामिल सेज़मीं गर्दूं से टकराई जहाँ दिल मिल गया दिल से
अज़ीज़ मेरठी
कलाम
विदाअ'-ए-गर्दिश-ए-अय्याम था तर्क-ए-चमन मेरान फिर शाम-ए-ख़िज़ाँ आई न फिर सुब्ह-ए-बहार आई
सीमाब अकबराबादी
कलाम
नसीम-ए-सुब्ह गुलशन में गुलों से खेलती होगीकिसी की आख़िरी हिचकी किसी की दिल लगी होगी
सीमाब अकबराबादी
कलाम
सुकूँ है कुछ इसी से इज़्तिराब-ए-ज़िंदगानी मेंवगरना ज़ात-ए-बाक़ी पैकर-ए-इंसान-ए-फ़ानी में
सीमाब अकबराबादी
कलाम
वहाँ तस्कीन-ए-ख़ातिर चार दिन से हुस्न-ए-आसूदायहाँ आशोब-ए-पहलू इक दिल-ए-दीवाना बरसों से
सीमाब अकबराबादी
कलाम
अभी महरम नहीं तो अश्क-ओ-आह-ए-आख़िर-ए-शब काहयात-अफ़रोज़ हैं आब-ओ-हवा-ए-दिल की तासीरें
सीमाब अकबराबादी
कलाम
हुदूद-ए-आलम-ए-तकवीं में सब मुमकिन ही मुमकिन हैतू ना-मुम्किन के झगड़े में न पड़ा इम्कान पैदा कर
सीमाब अकबराबादी
कलाम
न हो महव-ए-तमाशा ख़ल्वत-ए-महदूद हस्ती मेंगुज़र जा वुस'अत-ए-कौनैन की हद से नज़र हो कर