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कलाम
अपना महरम जो बनाया तुझे मैं जानता हूँमुझ से मुँह फिर क्यूँ छुपाया तुझे मैं जानता हूँ
शाह ख़ामोश साबरी
कलाम
ख़ाम की जाणन सार फ़क़र दी महरम नहीं दिल दे हूआब मिट्टी थीं पैदा होए खामी भांडे गिल्ल दे हू
सुल्तान बाहू
कलाम
शाह तक़ी राज़ बरेलवी
कलाम
पर्दा-ए-शौक़ है यही सूरत-ए-राज़ है यहीतुम हो नज़र के सामने मेरी नमाज़ है यही
शाह तक़ी राज़ बरेलवी
कलाम
'राज़' उस राज़ को क्या समझेंगे दुनिया वालेमेरी शाही है यही हाल-ए-फ़क़ीराना मिरा
शाह तक़ी राज़ बरेलवी
कलाम
ऐ दिल-ए-पुर-सुरूर-ए-मन नाज़ न बन नियाज़ बनसाक़ी-ए-मस्त-ए-नाज़ की आँखों में सरफ़राज़ बन
शाह मोहसिन दानापुरी
कलाम
अभी तक राज़ गर तुम को समझते हैं जहाँ वालेकहीं तुम ये न कह देना कि राज़-ए-दो-जहाँ मैं हौं
शाह तक़ी राज़ बरेलवी
कलाम
ऐ 'राज़' शक्ल-ए-राज़ को लिल्लाह छोड़ देसब के लबों पे 'आम हो अफ़्साना बन के जी
शाह तक़ी राज़ बरेलवी
कलाम
फ़ुग़ान-ए-राज़ को ऐ राज़ गर तुम क्यूँ नहीं सुनतेकि वो कब से फ़ुग़ाँ करता है तुम बेदार कैसे हो
शाह तक़ी राज़ बरेलवी
कलाम
वो आँख कि जिस ने परखा था समझा था हमारा राज़-ए-दिलऐ 'राज़' मज़ा तो ये देखो वो राज़ हमारा भूल गई