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कलाम
फ़लक दुश्मन हुआ गर्दिश-ज़दों को जब मिली राहतज़्यादा राह से खटके मुझे मंज़िल में रहते हैं
दाग़ देहलवी
कलाम
ये जहाँ भी तू है इस की आख़िरी मंज़िल भी तूबानी-ए-महफ़िल भी तू है ख़ातिम-ए-महफ़िल भी तू
मयकश अकबराबादी
कलाम
किया बे-घाट है 'औघट' जनाब-ए-शाह-'वारिस' नेसमझ में ख़ुद नहीं आती है ऐसी अपनी मंज़िल है
औघट शाह वारसी
कलाम
मैं उस मंज़िल में हूँ ये दिल की हालत होती जाती हैकि हर सूरत सज़ा-वार-ए-मोहब्बत होती जाती है
एहसान दानिश
कलाम
कैफ़ नियाज़ी
कलाम
हर क़दम के साथ मंज़िल लेकिन इस का क्या 'इलाज'इश्क़ ही कम-बख़्त मंज़िल-आश्ना होता नहीं
जिगर मुरादाबादी
कलाम
ख़ुदा 'मज्ज़ूब' को रख सलामत उस ने चौंकायाजिसे मंज़िल समझ रखा था वो इक ख़्वाब-ए-मंज़िल था
ख़्वाजा अज़ीज़ुल हसन मजज़ूब
कलाम
जनाब-ए-ख़िज़्र हम को ख़ाक रस्ते पर लगाएँगेकि मंज़िल बे-ख़ुदों की है मुअर्रा क़ैद-ए-मंज़िल से
एहसान दानिश
कलाम
उस बुत-ए-काफ़िर की मंज़िल का पता तो मिल गयाला-मकाँ की आख़िरी मंज़िल दिखा देना मुझे