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कलाम
मैं हूँ मज़हर-ए-दो-’आलम मैं हूँ सिर्र-ए-इस्म-ए-आ’ज़ममैं हूँ जल्वा-गाह इस दम बि-लिबास-ए-फ़ी-फ़नाई
ख़लील
कलाम
सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहाँज़िंदगी गर कुछ रही तो नौजवानी फिर कहाँ
ख़्वाजा मीर दर्द
कलाम
क्यूँ कर न समझूँ बादा-परस्ती को दीन-ए-हक़मैं रिन्द-ए-’इश्क़-बाज़ हूँ कुछ पारसा नहीं
मीर शम्सुद्दीन फ़ैज़
कलाम
रहा करते हैं पहरों महव-ए-नज़्ज़ारा में हम अपनेसरापा हो रहे हैं अब तो अपने आप दर्पन हम