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पिया रात तोरे गरे लागहम बड़े चैन से सोई
फरकन लाग सखी भुज मोराऔर लगै फरकै आँखों बाएँ
मोहन जागो उठो मुख धोवोद्वारे ठाड़े हैं लोग लुगाई
ये हम देखा अजब तमाशाघट घट पाया वही का बासा
कहा होवत है डंडी सोंतज कर वा को फंद
नींद उचट गई नीर बहे नितअंचरा होत निचुवन जोग
मोरा मनवा लाग गैलो प्यारे सोंअब घर मोसूँ रहिलो ना जाय
गुर की कृपा जब भई मो परतब घर में आयो पिया मेरे
मन ज़ुल्फन मा फँस फँस कैमोहे बताओ कब निकस सकै
छन पल घड़ी निस दिन तुम प्यारेबने रहो जिव आगे मोरे
किया मल’ऊन ने शह पर चढ़ाईफ़लक को आज तक रंज-ओ-’अना है
मैं 'सादिक़' हूँ शह-ए-ख़ैर मस्ती ने मुझ कोहँसाया रुलाया हिलाया मिलाया
बू यही गुल है यही बुलबुल-ए-नालाँ है यहीनख़्ल-ए-पैवंद यही और गुलिस्ताँ है यही
जिस को आज़ादी मिली है 'इश्क़ में फिर वो मुदामका'बा-ओ-बुत-ख़ाना में फिरता क़लंदर-वार है
इल्तिजा किस से करूँ तेरे सिवाया इलाही कर मिरी हाजत-रवा
जो रुख़्सार-ए-शह पे नज़र जाएगीगुलों से तबी'अत उतर जाएगी
जिस ने कोई यूसुफ़ कोई या'क़ूब बनायाउस ने मुझे तालिब तुझे मतलूब बनाया
निशाँ इस का किसी से कब बयाँ होवही पावे निशाँ जो बे-निशाँ हो
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