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कलाम
हमें क्या ग़म क़ियामत में जो पुर्सिश होने वाली हैकि जब वो फ़ित्ना-गर आया तो फिर मैदान ख़ाली है
दाग़ देहलवी
कलाम
नहीं आश्ना मिरे हाल से कोई आँख बज़्म-ए-मजाज़ मेंहूँ वो आईन: जो है ना-तमाम अभी ज़ेहन-ए-आईनः-साज़ में
सीमाब अकबराबादी
कलाम
हाल में अपने मस्त हूँ ग़ैर का होश ही नहींरहता हूँ मैं जहाँ में यूँ जैसे यहाँ कोई नहीं
ख़्वाजा अज़ीज़ुल हसन मजज़ूब
कलाम
अजब ही हाल है मेरा सनम जाने कि हम जानेंखुला है राज़ बातिन का सनम जाने कि हम जानें
मख़दूम ख़ादिम सफ़ी
कलाम
गंदुम को खा के 'रिज़वाँ' हैं ऐसे हाल में हमपहले 'उरूज पर थे अब हैं ज़वाल में हम
अज़ीज़ुद्दीन रिज़वाँ क़ादरी
कलाम
तिरे वा'दे को तब हीला-जू न क़रार है न क़याम हैकभी सुब्ह है कभी शाम है कभी सुब्ह है कभी शाम है