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कलाम
ज़मीं से नूरयान-ए-आसमाँ-परवाज़ कहते थेये ख़ाकी ज़िंदा-तर पाएँदा-तर ताबिंदा-तर निकले
अल्लामा इक़बाल
कलाम
क़त्ताल-ए-जहाँ मा'शूक़ जो थे सूने पड़े हैं मरक़द उन केजहाँ मरने वाले लाखों थे अब रोने वाला कोई नहीं
आरज़ू लखनवी
कलाम
समझते थे जिन्हें हम दूर-तर हम से क़रीं थे वोजहाँ की ख़ाक छानी 'इश्क़ में जिन के यहीं थे वो
अज्ञात
कलाम
वो भी क्या दिन थे कि जब हुस्न था उन का मा'सूमवो भी क्या दिन थे कि जब 'इश्क़ को कुछ होश न था
दिलगीर अकबराबादी
कलाम
माहिरउल क़ादरी
कलाम
शकेब जलाली
कलाम
दिल वारस्ता ही अपना अकेला रह गया आख़िरबहुत थे हम-सफ़र लेकिन हर इक पाबंद-ए-मंज़िल था
ख़्वाजा अज़ीज़ुल हसन मजज़ूब
कलाम
उस की ख़ुश्बू के जो ख़्वाहाँ थे क्यूँ न हुएतालिब-ए-बोसा-ए-रुख़ ज़ुल्फ़-ए-दोता क्यूँ न हुए
मुबारक हुसैन मुबारक
कलाम
ये हमीं थे जिन के लिबास पर सर-ए-रह सियाही लिखी गईयही दाग़ थे जो सजा के हम सर-ए-बज़्म-ए-यार चले गए