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कलाम
ताहिर मुरादाबादी
कलाम
तू बचा-बचा के न रख उसे तिरा आईना है वो आईनाकि शिकस्ता हो तो 'अज़ीज़-तर है निगाह-ए-आइना-साज़ में
अल्लामा इक़बाल
कलाम
तू बचा-बचा के न रख इसे तिरा आइना है वो आइनाकि शिकस्ता हो तो 'अज़ीज़-तर है निगाह-ए-आइना-साज़ में
अल्लामा इक़बाल
कलाम
फ़क़ीर-ए-बे-नवा का साज़-ओ-सामाँ देखते जाओकि शान-ए-फ़क़्र-ओ-फ़ख़्री है नुमायाँ देखते जाओ
शाह मोहसिन दानापुरी
कलाम
ख़ुदी के साज़ में है उ'म्र-ए-जावेदाँ का सुराग़ख़ुदी के सोज़ से रौशन हैं उम्मतों के चराग़
अल्लामा इक़बाल
कलाम
शिकस्ता दिल में रहते हैं है साबित उन के कहने सेतअ'ज्जुब है पता देते हैं अपना ला-मकाँ हो कर
तसद्दुक़ अ’ली असद
कलाम
जोशिश-ए-गिर्या ता-बके नाला-म-कुन मिसाल-ए-नेया'नी अपने दर्द का आप ही चारा-साज़ बन