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कलाम
फ़िराक़ गोरखपुरी
कलाम
अव्वल-ए-शब वो बज़्म की रौनक़ शम्अ' भी थी परवाना भीरात के आख़िर होते होते ख़त्म था ये अफ़्साना भी
आरज़ू लखनवी
कलाम
ये कहाँ थी मेरी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होतामेरी तरह काश उन्हें भी मेरा इंतिज़ार होता