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कीजिए न तंग गोशा-ए-ज़ुल्फ़-ए-सियाह कोरस्ता तो दीजिए दिल-ए-गुम-कर्दा राह को
वो दाम-ए-ज़ुल्फ़-ए-सियाह का बिछाए जाते हैंहमारे दिल को फँसाए जाते हैं
दिल मिरा ज़ुल्फ़-ए-सियह डस गई नागिन बन करबे-गुनाह दोस्त ने मारा मुझे दुश्मन बन कर
ज़ुल्फ़ बिखरे सियाह रात छाने लगेज़ुल्फ़ लहराए तो रात जाने लगे
हमेशा रंग-ए-ज़माना बदलता रहता हैसफ़ेद रंग हैं आख़िर सियाह मू करते
मेरा सियाह-ख़ाना कुछ इस क़दर था रौशनकुछ शम्अ' जगमगाए कुछ आप मुस्कुराएँ
अँधेर कर रही है ये चश्म-ए-सियाह मेंशोख़ी को क़ैद कीजिए नीची निगाह में
ये क्यूँ कहूँ कि लगी आग आशियाने कोकिया है बर्क़ ने रौशन सियाह-ख़ाने को
ज़ुल्फ़-ए-सियाह साक़ी-ए-रंगीं को देख करदिल मेरा मस्त बादा-ए-क़ालू बला हुआ
तमाम 'उम्र बसर की सियाह-कारी में'कलीम' तुझ को ख़ुदा का भी कुछ ख़तर आया
नामा सियाह मेरा महशर में मत निकालेहम को मिरे नबी के दामन तले लुका ले
आँखों में मेरी आ'लम सारा सियाह है अबमुझ को बग़ैर उस के आता नहीं नज़र कुछ
मेरी शामत से हो आरास्ता गेसू-ए-सियाह’आरिज़-ए-शाहिद-ए-महशर हो अगर हुस्न-ए-’अमल
हम ने देखा तुझे आँखों की सियाह पुतली मेंसात पर्दों में तुझे पर्दा-नशीं देख लिया
है बे-शुमार बुत मेरे क़ल्ब-ओ-सियाह मेंउन की निगाह-ए-नाज़ ने का'बा बना दिया
मिस्ल-ए-नगीं जो हम से हुआ काम रह गयाहम रू-सियाह जाते रहे नाम रह गया
मुझ से भी सियाह-कार को बख़्शे तो 'अजब क्यामुसतग़नी-ए-ज़ाती तिरी सरकार है या-रब
मैं तल्ख़ी-ए-हयात से घबरा के पी गयाग़म की सियाह रात से घबरा के पी गया
फिर भी मिरी निगाह में दूनों जहाँ सियाह नहींमेरी शब-ए-फ़िराक़ को चाँद ने रौशनी भी दी
शबाब-ए-गुलशन निसार तुम पर फ़िदा है हर इक बहार तुम परसियाह गेसू घनी घटाएँ नशीली आँखें शराब-ख़ाना
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