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कलाम
फ़िराक़ गोरखपुरी
कलाम
अव्वल-ए-शब वो बज़्म की रौनक़ शम्अ' भी थी परवाना भीरात के आख़िर होते होते ख़त्म था ये अफ़्साना भी
आरज़ू लखनवी
कलाम
'अक़्ल का हुक्म है उधर तू न जाना ऐ दिल'इश्क़ कहता है कि फिर वाँ से न आना ऐ दिल
शाह तुराब अली क़लंदर
कलाम
कम कोई फ़ुक़रा से मिलता है ख़ुदा के वास्तेदफ़-ए’-आ'दा के लिए या कीमिया के वास्ते
शाह तुराब अली क़लंदर
कलाम
ख़याल-ए-पीर का जिस के हुआ है दिल में नशिस्तवो तिफ़्ल ख़ूब जवाँ-बख़्त है और पीर-परस्त
शाह तुराब अली क़लंदर
कलाम
मैं पीर-ए-इ'श्क़ हूँ मज्नूँ मुरीद है मेरावो आ'शिक़ी में ख़लीٖफ़ा रशीद है मेरा
शाह तुराब अली क़लंदर
कलाम
हदफ़ जिस का फ़क़त दिल हो मैं ऐसे तीर के क़ुर्बांबदन जिस से न घाइल हो मैं उस शमशीर के क़ुर्बां