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कलाम
ताबिश कानपुरी
कलाम
जीवंदयाँ मर रहणा होवे ताँ देस फ़कीराँ बहिये हूजे कोई सुट्टे गुद्दड़ कूड़ा वांग अरूड़ी रहिए हू
सुल्तान बाहू
कलाम
ज़मीं से नूरयान-ए-आसमाँ-परवाज़ कहते थेये ख़ाकी ज़िंदा-तर पाएँदा-तर ताबिंदा-तर निकले
अल्लामा इक़बाल
कलाम
ठान ली मैं ने भी साक़ी यहीं मर जाने कीकितनी दिलकश हैं फ़ज़ाएँ तेरे मय-ख़ाने की
पीर नसीरुद्दीन नसीर
कलाम
क़त्ताल-ए-जहाँ मा'शूक़ जो थे सूने पड़े हैं मरक़द उन केजहाँ मरने वाले लाखों थे अब रोने वाला कोई नहीं
आरज़ू लखनवी
कलाम
समझते थे जिन्हें हम दूर-तर हम से क़रीं थे वोजहाँ की ख़ाक छानी 'इश्क़ में जिन के यहीं थे वो