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कलाम
फँसा जब से दिल-ए-शैदा सनम की ज़ुल्फ़-ए-पेचाँ मेंबसर होती है हर शब एक ही ख़्वाब-ए-परेशाँ में
सय्यद अली केथ्ली
कलाम
वो मस्त-ए-नाज़ आता है ज़रा हुशियार हो जानायहीं देखा गया है बे-पिए सरशार हो जाना
ख़्वाजा अज़ीज़ुल हसन मजज़ूब
कलाम
कोई जाने तो क्या जाने वो दिखता है हज़ारों मेंसितम-गारों में ’अय्यारों में दिल-दारों में यारों में
दाग़ देहलवी
कलाम
ज़ाहर वेखां जानी ताईं नाले अंदर सीने हूबिरहों मारी नित फ़िरां मैं हस्सण लोक नाबीने हू
सुल्तान बाहू
कलाम
आंधियों और मौज-ए-तूफ़ाँ से गुज़र जाने के बा'दनाव डूबी है मिरी दरिया उतर जाने के बा'द
साग़र सिल्लोड़ी
कलाम
’आलम-ए-सूरत का छुप जाना 'अयाँ हो जाएगाये मुरक़्क़ा' इक दिन आँखों से निहाँ हो जाएगा
ग़ुलाम अ’ली रासिख़
कलाम
जो बंदा-ए-जान-ए-जानाँ है तो जान जाने से क्या मतलबजो महव-ए-रू-ए-जाना है तो होश आने से क्या मतलब
अज्ञात
कलाम
ठान ली मैं ने भी साक़ी यहीं मर जाने कीकितनी दिलकश हैं फ़ज़ाएँ तेरे मय-ख़ाने की
पीर नसीरुद्दीन नसीर
कलाम
खुल गए ज़ख़्मों के मुँह क्या जाने क्या कहने को हैंक्या नमक-दान-ए-सितम को बे-मज़ा कहने को हैं
ख़्वाजा नासिरुद्दीन चिश्ती
कलाम
उस बुत-ए-काफ़िर के दर पे अब तो जाना ही पड़ाहो गया है बस ख़फ़ा मुझ को मनाना ही पड़ा
नियाज़ वज़ीराबादी
कलाम
दिल काले तों मुँह काला चंगा जे कोई उस नूँ जाणे हूमुँह काला दिल अच्छा होवे ताँ दिल यार पछाणे हू
सुल्तान बाहू
कलाम
अजब ही हाल है मेरा सनम जाने कि हम जानेंखुला है राज़ बातिन का सनम जाने कि हम जानें