जब फूल का सरसों के हुआ आ के खिलनता
जब फूल का सरसों के हुआ आ के खिलनता
और ऐश की नज़रों से निगाहों का लड़नता
हम ने भी दिल अपने के तईं कर के न-चिंता
और हँस के कहा यार से ऐ लक्कड़ भवनता
सब की तो बसंतें हैं पे यारों का बसंता
इक फूल का गेंदों के मंगाया है बजरा
दस मन का लिया हार गुँधा हाथ का गजरा
जब आँख से सूरज की ढला रात का गजरा
जा यार से मिल कर ये कहा ऐ मिरे रजरा
सब की तो बसंतें हैं पे यारों का बसंता
थे अपने गले में तो कई मन के पड़े हार
और यार के गजरे भी थे इक धवन की मिक़दार
आँखों में नशे मय के उबलते थे धुआँ-धार
जो सामने आता था यही कहते थे ललकार
सब की तो बसंतें हैं ये यारों का बसंता
पगड़ी में हमारी थे जो गेंदों के कई पेड़
हर झोंक में लगती थी बसंतों के तईं एड़
साक़ी ने भी मटके से दिया मुँह के तईं भेड़
हर बात में होती थी उसी बात की आ छेड़
सब की तो बसंतें हैं पे यारों का बसंता
फिर राग बसंती का हुआ आन के खटका
घोंसे के बराबर वो लगाया बाजने मटका
दिल खेत में सरसों के हर इक फूल से अटका
हर बात में होता था उसी बात का लटका
सब की तो बसंतें हैं पे यारों का बसंता
जब खेत पे सरसों के दिया जा के क़दम गाड़ा
सब खेत उठा सर के उपर रख लिया झुजाड़
महबूब रंगीलों की भी इक साथ लगी झाड़
हर झाड़ से सरसों के भी कहती थी अभी झाड़
सब की तो बसंतें हैं पे यारों का बसंता
ख़ुश बैठे हैं सब शाह-ओ-वज़ीर आज आह-हा
दिल-शाद हैं अदना-ओ-फ़क़ीर आज आहा-हा
बुलबुल की निकलती है सफ़ीर आज आहा-हा
कहता यही फिरता है 'नज़ीर' आज आहा-हा
सब की तो बसंतें हैं पे यारों का बसंता
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