Font by Mehr Nastaliq Web

काबा काशी, गंगा जमना, कूचा और बाज़ार सखी

नईम सरमद

काबा काशी, गंगा जमना, कूचा और बाज़ार सखी

नईम सरमद

MORE BYनईम सरमद

    काबा काशी, गंगा जमना, कूचा और बाज़ार सखी

    उसके दो नैनों के आगे सब कुछ है बेकार सखी

    उसका माथा हिम पर्बत सा ऊँचा और चमकीला है

    और उसके कोमल अधरों से बहती है रसधार सखी

    उसकी ज़ुल्फ़ें काली शब हैं, शाने उगते सूरज से

    और ये रातें चूम रही हैं दिन को बारम्बार सखी

    इक यूसुफ़ है जिसकी ख़ातिर उंगलियाँ काटे बैठी हूँ

    एक मसीहा के चक्कर में हो गई हूँ बीमार सखी

    हम दोनों के यार सखी री सब के सब अलबेले हैं

    मैं लैला की पक्की सहेली वो मजनूँ के यार सखी

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY
    बोलिए